भारत में भूजल प्रदूषण संकट: एक गंभीर चुनौती और सुधार की रणनीतियाँ
भारत के लिए भूजल एक अत्यंत महत्वपूर्ण संसाधन है, जो ग्रामीण इलाकों में 85% से अधिक पीने के पानी और 65% सिंचाई जल की जरूरतें पूरी करता है। हालांकि, 2024 में केंद्रीय भूमिगत जल बोर्ड (CGWB) की रिपोर्ट ने देश में भूजल प्रदूषण की गंभीर समस्या को उजागर किया है, जो स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन गई है।
प्रदूषण का स्वरूप और कारण
देश के विभिन्न हिस्सों में भूजल में नाइट्रेट, फास्फोरस, आर्सेनिक, यूरेनियम और भारी धातुओं की मात्रा खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी है। नाइट्रेट प्रदूषण का मुख्य स्रोत अत्यधिक रासायनिक खाद का उपयोग और खराब सीवेज प्रबंधन है। फास्फोरस प्रदूषण राजस्थान, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में व्यापक है, जहां दंत और कंकाल फ्लोरोसिस के मामले बढ़ रहे हैं। पंजाब और बिहार के कुछ इलाकों में आर्सेनिक के स्तर WHO की सीमा से कई गुना अधिक हैं, जो कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों की वजह बन रहे हैं। यूरेनियम और भारी धातुओं का प्रभाव भी स्वास्थ्य पर विकराल है, जिनसे गुर्दा, तंत्रिका तंत्र और शारीरिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
स्वास्थ्य पर प्रभाव
फ्लोराइड प्रदूषण से जोड़ों में दर्द, हड्डियों में विकृति और विकास में बाधा उत्पन्न होती है। आर्सेनिक से त्वचा के घाव, कैंसर, और श्वसन रोग बढ़ते हैं। नाइट्रेट प्रदूषण ब्लू बेबी सिंड्रोम और अन्य विषाक्तता से जुड़ा है। यूरेनियम के कारण गुर्दे की क्षति के मामलों में वृद्धि हुई है। भारी धातुओं से हीमोग्लोबिन की कमी, प्रतिरक्षा विकार और मानसिक समस्याएं होती हैं। साथ ही, गंदा भूजल कोलेरा, हैपेटाइटिस और दस्त जैसी जलजनित बीमारियां फैलाने का मुख्य कारण है।
प्रमुख उदाहरण
उत्तर प्रदेश के बudhपुर में विषैले औद्योगिक अपशिष्ट के कारण गुर्दे की विफलता से 13 मौतें हुईं। जालौन में हैंडपंप में पेट्रोलियम जैसा पानी पाया गया। भुवनेश्वर के पैकारापुर इलाक़े में सीवेज पानी के रिसाव से बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में आर्सेनिक की मात्रा सुरक्षित सीमा से 20 गुना अधिक पाई गई, जिससे कैंसर के कई मामले सामने आए।
प्रबंधन और नियामक चुनौतियां
भारत में भूजल संरक्षण का प्रबंधन असंगठित और कमजोर है। 1974 का जल प्रदूषण अधिनियम भूजल प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रख पाता। CGWB के पास पर्याप्त नियामक शक्तियां नहीं हैं। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के संसाधन सीमित हैं। विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय कमज़ोर है, जिससे निगरानी में सेंध लगती है। अत्यधिक जल निकासी भूजल स्तर को कम कर देती है, जिससे प्रदूषक सघन होते हैं।
समाधान और सुधार के उपाय
राष्ट्रीय भूजल प्रदूषण नियंत्रण ढांचा आवश्यक है, जो CGWB को सशक्त और एजेंसियों के कर्तव्यों को स्पष्ट करे।
आधुनिक निगरानी तकनीकों जैसे रियल-टाइम सेंसर और रिमोट सेंसिंग को अपनाना होगा।
स्वास्थ्य निगरानी के साथ जल गुणवत्ता डेटा को जोड़ा जाए ताकि प्रारंभिक चेतावनी मिल सके।
आर्सेनिक और फ्लोराइड निकालने के कम्युनिटी लेवल सिस्टम को बढ़ावा दिया जाए।
शहरी और औद्योगिक अपशिष्ट के लिए ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज नियमों का कड़ाई से पालन हो।
कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को विनियमित कर जैविक जैव-कृषि को प्रोत्साहित किया जाए।
स्थानीय शासन और नागरिक भागीदारी को मजबूत कर भूजल प्रबंधन में सामुदायिक योगदान बढ़ाया जाए।
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